भारत में कमजोर मॉनसून और अल-नीनो के प्रभाव से पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग कार्यक्रम पर असर पड़ने की आशंका है. इस साल बारिश सामान्य से करीब 13 प्रतिशत कम रहने के कारण मक्का और गन्ने की पैदावार प्रभावित हुई है. ये दोनों फसलें इथेनॉल उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल हैं. ऐसे में इनकी उपलब्धता घटने से इथेनॉल उत्पादन पर दबाव बढ़ सकता है.

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Reuters की रिपोर्ट के मुताबिक, खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता देने और कच्चे माल की कमी के कारण पेट्रोल में इथेनॉल ब्लेंडिंग 20 प्रतिशत से घटकर 15 से 17 प्रतिशत तक रह सकती है. मक्का और चीनी की कीमतों में लगभग 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी ने भी इथेनॉल उत्पादन की लागत बढ़ा दी है. वहीं, चावल की कीमतों में करीब 20 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है. सितंबर में खुदरा खाद्य महंगाई दर बढ़कर 7.74 प्रतिशत पहुंच गई.

भारत ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने का लक्ष्य निर्धारित समय से करीब पांच साल पहले हासिल किया था. इस कार्यक्रम के जरिए 2014 से अब तक लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के तेल आयात की बचत हुई है. इथेनॉल ब्लेंडिंग से विदेशी तेल पर निर्भरता कम करने और पर्यावरणीय प्रदूषण घटाने में भी मदद मिलती है.

इथेनॉल उत्पादन के लिए कंपनियों ने अपनी क्षमता बढ़ाकर सालाना करीब 20 अरब लीटर कर दी थी. हालांकि, कमजोर मॉनसून और खाद्य पदार्थों की बढ़ती कीमतों के कारण अब इस उद्योग के सामने नई चुनौतियां हैं. सरकार ने चीनी आधारित इथेनॉल की खरीद रोकने और मक्का आधारित इथेनॉल की खरीद कीमत घटाने जैसे कदम भी उठाए हैं.

इस स्थिति में भारत के सामने खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है. आने वाले समय में फसलों की उपलब्धता, इथेनॉल उत्पादन और पेट्रोल में ब्लेंडिंग की वास्तविक दर पर नजर रहेगी.