महाराष्ट्र के नासिक स्थित श्री सप्तशृंगी निवासिनी देवी मंदिर ट्रस्ट में नियुक्तियों को रोकने के मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक विशेष अधिकारी को कड़ी फटकार लगाई है। कोर्ट ने कहा कि अधिकारी ने तत्कालीन चीफ जस्टिस के नाम का गलत इस्तेमाल करते हुए ऐसा आदेश जारी किया, जिसकी उन्हें मंजूरी ही नहीं मिली थी। अदालत ने संबंधित पत्र और नियुक्तियों पर रोक लगाने वाले आदेश को रद्द कर दिया है।

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यह मामला सप्तशृंगी देवी ट्रस्ट में पांच नए ट्रस्टियों की नियुक्ति से जुड़ा है। सितंबर 2025 में इन पदों के लिए विज्ञापन जारी किया गया था, जिसमें करीब 625 आवेदन मिले थे। चयन प्रक्रिया पूरी होने के बाद 12 मार्च 2026 को पांच उम्मीदवारों के नामों की सिफारिश की गई थी।

इसके दो दिन बाद 14 मार्च को तत्कालीन चीफ जस्टिस के विशेष अधिकारी अंजू शेंडे ने नासिक के प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश को ईमेल भेजा। इसमें चयनित उम्मीदवारों की सूची वेबसाइट से हटाने और नियुक्ति प्रक्रिया को अगले आदेश तक रोकने के लिए कहा गया था। पत्र में दावा किया गया था कि यह निर्देश तत्कालीन चीफ जस्टिस श्री चंद्रशेखर के मौखिक आदेश पर दिया गया है।

हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट की सुनवाई में सामने आया कि इस मामले में चीफ जस्टिस के सामने कोई आधिकारिक प्रस्ताव नहीं रखा गया था और न ही उनकी मंजूरी ली गई थी।

जस्टिस जीएस कुलकर्णी और जस्टिस नीला गोखले की पीठ ने अधिकारी की कार्रवाई को गंभीर अनुचित व्यवहार बताया। कोर्ट ने कहा कि चीफ जस्टिस के कार्यालय में काम करने का मतलब यह नहीं है कि उनके नाम पर बिना अनुमति कोई आदेश जारी किया जा सकता है।

अदालत ने विशेष अधिकारी का पत्र और नासिक जिला न्यायाधीश का स्थगन आदेश रद्द कर दिया। इससे मंदिर ट्रस्ट में पांच ट्रस्टियों की नियुक्ति प्रक्रिया का रास्ता फिर खुल गया है।