दिल्ली में बारिश होने पर लोगों को प्रदूषण से कुछ समय के लिए राहत जरूर मिलती है, लेकिन यह राहत ज्यादा दिनों तक नहीं टिकती। 2003 से 2024 तक के आंकड़ों पर आधारित 22 साल की एक स्टडी में सामने आया है कि बारिश के बाद आधे से ज्यादा मामलों में प्रदूषण के कण पांच दिनों के भीतर फिर पुराने स्तर पर पहुंच गए। यह अध्ययन बताता है कि सिर्फ बारिश के भरोसे दिल्ली की हवा को साफ नहीं रखा जा सकता।
शोधकर्ताओं ने दिल्ली में बारिश की 612 घटनाओं का विश्लेषण किया। इनमें 310 मामलों यानी करीब 50.7 फीसदी घटनाओं में बारिश के बाद दो से पांच दिनों के भीतर प्रदूषण के कण पहले वाले स्तर पर लौट आए। वहीं, करीब 38 फीसदी मामलों में प्रदूषण को पुराने स्तर तक पहुंचने में 6 से 30 दिन लगे। लगभग 12 फीसदी घटनाओं में 30 दिन बाद भी प्रदूषण पुराने स्तर पर नहीं पहुंचा था।
यह रिसर्च अमृता विश्व विद्यापीठम के शोधकर्ताओं गायत्री बालचंद्रन और डॉ. सुमित सतींद्रन एस ने की है। इसे जर्नल ऑफ एटमॉस्फेरिक एंड सोलर-टेरिस्ट्रियल फिजिक्स में प्रकाशित किया गया है।
स्टडी के मुताबिक, बारिश वातावरण में मौजूद प्रदूषण के कणों को नीचे गिराने में मदद करती है, लेकिन वाहनों, फैक्ट्रियों और निर्माण गतिविधियों से लगातार निकलने वाला धुआं और धूल फिर से प्रदूषण बढ़ा देते हैं। इसके अलावा वातावरण में रासायनिक प्रक्रियाओं से नए प्रदूषण कण भी बनते हैं।
शोध में यह भी सामने आया कि ज्यादा बारिश होने का मतलब लंबे समय तक साफ हवा मिलना नहीं है। बारिश की मात्रा और प्रदूषण के दोबारा बढ़ने के समय के बीच कोई महत्वपूर्ण संबंध नहीं मिला।
शोधकर्ताओं का कहना है कि दिल्ली में प्रदूषण कम करने के लिए वाहनों, उद्योगों और अन्य स्रोतों से होने वाले उत्सर्जन पर पूरे साल नियंत्रण जरूरी है।


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