उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र में बसा पीलीभीत अपनी प्राकृतिक सुंदरता, जंगलों और सांस्कृतिक पहचान के लिए जाना जाता है. नेपाल सीमा से सटे इस जिले को अक्सर 'मिनी पंजाब' कहा जाता है. इसकी वजह यहां रहने वाली बड़ी सिख आबादी और खेती-किसानी से जुड़ी जीवनशैली है. खासतौर पर पूरनपुर क्षेत्र में सिख समुदाय की मजबूत मौजूदगी देखने को मिलती है. विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए कई सिख परिवारों ने तराई में बसकर खेती और कारोबार को नई पहचान दी.
पीलीभीत की पहचान सिर्फ सिख संस्कृति तक सीमित नहीं है. यहां का पीलीभीत टाइगर रिजर्व वन्यजीवों और प्राकृतिक पर्यटन के लिए मशहूर है. जिले को 'बांसुरी नगरी' भी कहा जाता है, क्योंकि यहां पारंपरिक बांसुरी बनाने का उद्योग लंबे समय से फल-फूल रहा है. गोमती नदी का उद्गम स्थल भी इसी जिले में माना जाता है. गन्ना, धान और गेहूं यहां की अर्थव्यवस्था के प्रमुख आधार हैं.
राजनीतिक रूप से पीलीभीत लंबे समय तक गांधी परिवार की पहचान से जुड़ा रहा है. मेनका गांधी और वरुण गांधी यहां से सांसद रह चुके हैं और जिले की राजनीति में उनका प्रभाव रहा है. हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने वरुण गांधी की जगह जितिन प्रसाद को टिकट दिया था. इसके बाद जिले की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज हुई.
पीलीभीत जिले में चार विधानसभा सीटें हैं- पीलीभीत, बरखेड़ा, पूरनपुर और बीसलपुर. 2017 और 2022 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी ने इन सभी सीटों पर जीत हासिल की थी. वर्तमान में जिले की चारों सीटों पर बीजेपी के विधायक हैं. पीलीभीत सदर से संजय सिंह गंगवार, बरखेड़ा से प्रवक्तानंद, पूरनपुर से बाबूराम पासवान और बीसलपुर से विवेक वर्मा विधायक हैं.
2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यहां जातीय और सामाजिक समीकरण अहम माने जा रहे हैं. कुर्मी, मुस्लिम, सिख, पासी और अन्य ओबीसी समुदायों की भूमिका चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकती है. इसके अलावा किसानों के मुद्दे, गन्ना भुगतान, फसलों की खरीद और स्थानीय विकास भी मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण विषय हैं.
पीलीभीत की राजनीति में बीजेपी के सामने अपनी पिछली जीत को दोहराने की चुनौती होगी, जबकि विपक्ष जिले में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश करेगा. ऐसे में 'मिनी पंजाब' की चार विधानसभा सीटों पर 2027 का मुकाबला दिलचस्प रहने की संभावना है.


0 comments
No comments yet. Yours would be the first.