उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में ग्लेशियल झीलों से अचानक आने वाली बाढ़ के खतरे को कम करने के लिए बड़ा कदम उठाया गया है। रुड़की स्थित केंद्रीय भवन अनुसंधान संस्थान (CBRI) के वैज्ञानिकों ने चमोली जिले के वसुंधरा ताल में स्वदेशी तकनीक से विकसित अर्ली वॉर्निंग सिस्टम स्थापित किया है। यह भारत में किसी ग्लेशियल झील पर लगाया गया अपनी तरह का पहला स्वदेशी सिस्टम बताया जा रहा है।

AdvertisementThe Puranic

इस सिस्टम का मुख्य उद्देश्य झील के जलस्तर और आसपास होने वाली असामान्य गतिविधियों पर नजर रखना है। इसके जरिए ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी GLOF के संभावित खतरे का पहले पता लगाने में मदद मिलेगी। वैज्ञानिकों के अनुसार, सिस्टम से करीब दो घंटे पहले चेतावनी मिलने की उम्मीद है। इससे प्रशासन को निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सतर्क करने और जरूरत पड़ने पर सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने का समय मिल सकता है।

रिपोर्ट के मुताबिक, इस सिस्टम को विकसित करने और स्थापित करने में लगभग 61 लाख रुपये खर्च हुए, जबकि इसकी अनुमानित लागत करीब आठ करोड़ रुपये बताई गई थी। इसमें कुल आठ सेंसर लगाए गए हैं। इनमें झील के पानी का स्तर मापने वाले सेंसर और आसपास की भूगर्भीय हलचल, भूस्खलन तथा हिमस्खलन जैसी गतिविधियों को रिकॉर्ड करने वाले एक्सेलेरोमीटर शामिल हैं। दुर्गम क्षेत्र में बिजली की जरूरत पूरी करने के लिए सोलर पैनल भी लगाए गए हैं।

उत्तराखंड में 2023 के आंकड़ों के अनुसार 344 ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई थी, जिनमें 13 को उच्च जोखिम वाली श्रेणी में रखा गया है। वसुंधरा ताल भी इनमें शामिल है। ग्लेशियल झील का प्राकृतिक अवरोध टूटने या अचानक पानी निकलने से नीचे के क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़ आ सकती है। ऐसे में यह सिस्टम आपदा की निगरानी और समय रहते चेतावनी देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। हालांकि, यह हर बाढ़ को रोकने की गारंटी नहीं है।