टाटा समूह के इतिहास में 1990 का दशक सत्ता संघर्ष के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण रहा। 1991 में रतन टाटा ने जेआरडी टाटा से टाटा संस की अध्यक्षता संभाली, लेकिन समूह की कई बड़ी कंपनियों पर लंबे समय से प्रभावशाली अधिकारियों का मजबूत नियंत्रण था।


उस दौर में टाटा स्टील (तत्कालीन TISCO) के प्रमुख रूसी मोदी सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल थे। टाटा समूह का ढांचा काफी हद तक विकेंद्रीकृत था और अलग-अलग कंपनियों के प्रमुखों को व्यापक स्वायत्तता हासिल थी। रतन टाटा समूह में ज्यादा केंद्रीय निगरानी और एकीकृत नेतृत्व चाहते थे।


1992 में TISCO में उत्तराधिकार को लेकर रतन टाटा और रूसी मोदी के बीच मतभेद खुलकर सामने आए। इसी दौरान टाटा समूह ने वरिष्ठ अधिकारियों और निदेशकों के लिए सेवानिवृत्ति की आयु सीमा से जुड़ी नीति लागू की। इसके बाद मोदी समेत कई पुराने दिग्गज धीरे-धीरे समूह की प्रमुख भूमिकाओं से बाहर हुए। मोदी ने 1993 में TISCO छोड़ा, जबकि दरबारी सेठ और अजीत केरकर भी बाद के वर्षों में अपने पदों से अलग हुए।


इन बदलावों ने टाटा संस के केंद्रीय प्रभाव को मजबूत किया। इसके बाद समूह ने अधिक एकीकृत रणनीति के साथ वैश्विक विस्तार किया और टेटली, कोरस तथा जगुआर लैंड रोवर जैसे बड़े अधिग्रहण किए।


आज बॉम्बे हाउस एक बार फिर सत्ता और नियंत्रण से जुड़े विवाद के केंद्र में है। एन चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति और टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर नोएल टाटा और टाटा संस के बोर्ड के बीच मतभेद सामने आए हैं। हालांकि वर्तमान विवाद की परिस्थितियां 1990 के दशक से अलग हैं, दोनों घटनाएं टाटा समूह में अधिकार और शासन व्यवस्था के सवाल को सामने लाती हैं।