यमन के हूती विद्रोहियों के सस्ते ड्रोन और मिसाइल हमले सऊदी अरब की हवाई सुरक्षा के लिए चुनौती बन रहे हैं। सऊदी अरब के पास अमेरिका के पैट्रियट और THAAD जैसे आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम हैं, लेकिन इसके बावजूद कुछ हमले सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देने में सफल रहे हैं। इससे सवाल उठता है कि करोड़ों रुपये की रक्षा तकनीक के सामने कम लागत वाले ड्रोन इतने प्रभावी कैसे साबित हो रहे हैं।
इसकी एक बड़ी वजह हूतियों की हमले की रणनीति है। वे ड्रोन और अलग-अलग तरह की मिसाइलों का इस्तेमाल कर सकते हैं। जब कई हथियार अलग-अलग दिशाओं, ऊंचाइयों और गति से एक साथ आते हैं, तो उन्हें पहचानना और रोकना मुश्किल हो सकता है। ऐसे हमलों में एयर डिफेंस सिस्टम को बहुत कम समय में फैसला लेना पड़ता है।
दूसरी बड़ी चुनौती इंटरसेप्टर मिसाइलों की लागत है। पैट्रियट और THAAD जैसे सिस्टम दुश्मन के हथियारों को हवा में नष्ट करने के लिए महंगी मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं। इसके उलट, कुछ ड्रोन अपेक्षाकृत कम लागत में तैयार किए जा सकते हैं। ऐसे में सस्ते ड्रोन को रोकने के लिए महंगे इंटरसेप्टर इस्तेमाल करना आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण हो सकता है। लगातार हमलों की स्थिति में इंटरसेप्टर मिसाइलों का भंडार भी दबाव में आ सकता है।
सऊदी अरब के लिए अपने विशाल क्षेत्र और महत्वपूर्ण ठिकानों की सुरक्षा करना भी आसान नहीं है। तेल प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों की रक्षा के लिए रडार और एयर डिफेंस सिस्टम का प्रभावी नेटवर्क जरूरी है। किसी भी सुरक्षा व्यवस्था की क्षमता हथियारों की संख्या, तैनाती और समय पर मिलने वाली चेतावनी पर निर्भर करती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि सऊदी अरब का एयर डिफेंस पूरी तरह विफल हो गया है। आधुनिक सिस्टम कई हमलों को रोकने में सक्षम हैं, लेकिन लगातार बदलती ड्रोन तकनीक और कम लागत वाले हथियार उनके सामने नई चुनौतियां खड़ी कर रहे हैं।



0 comments
No comments yet. Yours would be the first.