नेपाल-तिब्बत सीमा पर 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी देशों के बीच आपदा संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस आपदा में नेपाल में 1,400 से अधिक लोगों की मौत हुई और हजारों लोग लापता हो गए। बाढ़ ने सड़कें, पुल और कई बस्तियां तबाह कर दीं।
नेपाल के प्रधानमंत्री बलेंद्र शाह ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत और चीन के सहयोग से हिमालयी जलवायु लचीलापन तंत्र बनाने का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य ग्लेशियरों की निगरानी, वैज्ञानिक आंकड़ों का आदान-प्रदान और समय रहते बाढ़ की चेतावनी देना है।
इस बीच, तिब्बत से आने वाली सूचनाओं पर चीन के नियंत्रण को लेकर भी सवाल उठे हैं। चीनी अधिकारियों के अनुसार, आपदा संबंधी गलत जानकारी फैलाने के आरोप में 10 लोगों को दंडित किया गया। चीन ने इसे अफवाहें रोकने के लिए जरूरी बताया, जबकि आलोचकों ने स्वतंत्र रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध को लेकर चिंता जताई।
भारत के लिए यह मुद्दा महत्वपूर्ण है क्योंकि नेपाल की त्रिशुली-नारायणी नदी आगे चलकर गंडक के रूप में बिहार में प्रवेश करती है। ऊपरी इलाकों में अचानक आई बाढ़ भारतीय क्षेत्रों को भी प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, उपग्रह चित्रों, मौसम सेंसर, नदी जलस्तर और ग्लेशियरों से जुड़े आंकड़ों की समय पर साझेदारी जरूरी है। भारत, नेपाल और चीन के बीच बेहतर समन्वय से सीमावर्ती समुदायों को समय रहते चेतावनी मिल सकती है और भविष्य में जान-माल के नुकसान को कम किया जा सकता है।


