इसके अलावा कुछ विमानों को सैन्य संग्रहालयों, रक्षा प्रतिष्ठानों और प्रमुख सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित किया जाएगा। इससे आने वाली पीढ़ियां भारतीय वायु सेना के इस ऐतिहासिक लड़ाकू विमान के बारे में जान सकेंगी।
सेवामुक्त विमानों के उपयोगी उपकरण और पुर्जे अलग करके सुरक्षित रखे जाएंगे। कुछ सामग्री इंजीनियरिंग कॉलेजों को प्रशिक्षण और तकनीकी अध्ययन के लिए भी उपलब्ध कराई जा सकती है। हालांकि, कितने विमानों को कबाड़ में बदला जाएगा, इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
हरियाणा के रोहतक-दिल्ली राजमार्ग पर स्थित एक ढाबे के बाहर भी पुराने मिग-21 का ढांचा प्रदर्शित है।
मिग-21 ने भारतीय वायु सेना में कई पीढ़ियों के पायलटों को प्रशिक्षण और युद्ध का अनुभव दिया। अपने चरम पर वायु सेना के लड़ाकू बेड़े में इसकी हिस्सेदारी लगभग 60 प्रतिशत थी। हालांकि, लंबे सेवाकाल के दौरान दुर्घटनाओं और पायलटों की मौत ने इसकी विरासत पर गंभीर सवाल भी खड़े किए।


