अमेरिका और भारत के रिश्तों में रूसी कच्चे तेल को लेकर तनाव बढ़ता दिख रहा है। अमेरिकी संसद से पारित रूस और ईरान पर प्रतिबंधों से जुड़े कानून के बाद भारत समेत उन देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान चर्चा में है, जो रूस से तेल और गैस खरीदना जारी रखते हैं। भारत और चीन रूसी ऊर्जा के बड़े खरीदार हैं, इसलिए दोनों इस नीति के केंद्र में हैं।
इस दबाव के पीछे केवल रूस-यूक्रेन युद्ध नहीं, बल्कि अमेरिका की चीन को लेकर पिछली नीति का अनुभव भी एक कारण बताया जा रहा है। अमेरिकी उप विदेश मंत्री क्रिस्टोफर लैंडौ ने मार्च 2026 में कहा था कि अमेरिका भारत के साथ चीन जैसी गलतियां दोहराना नहीं चाहता। उनका संकेत उस दौर की ओर था, जब अमेरिकी कंपनियों और नीतियों ने चीन के व्यापार, निवेश और विनिर्माण विस्तार में योगदान दिया।
विश्व बैंक के अनुसार 2025 में चीन की अर्थव्यवस्था करीब 19.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गई, जबकि अमेरिकी जीडीपी करीब 30.8 ट्रिलियन डॉलर रही। वहीं वैश्विक विनिर्माण में चीन की हिस्सेदारी भी दशकों में तेजी से बढ़ी है।
हालांकि भारत की स्थिति चीन से अलग है। नई दिल्ली लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता की नीति अपनाती रही है और ऊर्जा जरूरतों के लिए अलग-अलग देशों पर निर्भर रहती है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए सस्ती और स्थिर ऊर्जा आपूर्ति उसके लिए महत्वपूर्ण है।
भारत ने स्पष्ट किया है कि उसकी ऊर्जा खरीद उपलब्धता, कीमत और बाजार परिस्थितियों से तय होती है। ऐसे में अमेरिकी टैरिफ दबाव भारत की विदेश नीति और ऊर्जा सुरक्षा के बीच संतुलन को और महत्वपूर्ण बना सकता है। दोनों देशों के बीच आगे की बातचीत इस तनाव की दिशा तय करेगी।