1998 में भारत के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने नई दिल्ली पर कई कड़े प्रतिबंध लगाए थे। विदेशी सहायता, वित्तीय सहयोग, सैन्य सहयोग और तकनीकी हस्तांतरण पर रोक के जरिए अमेरिका भारत पर अपनी परमाणु नीति बदलने का दबाव बनाना चाहता था। हालांकि, भारत अपने रुख से पीछे नहीं हटा।


तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने परमाणु परीक्षणों को राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा फैसला बताया। प्रतिबंधों का असर भारत की कुछ रक्षा और विकास परियोजनाओं पर पड़ा, लेकिन अर्थव्यवस्था पूरी तरह प्रभावित नहीं हुई। भारत ने आर्थिक सुधारों की गति बनाए रखी और अमेरिका के अलावा यूरोप, रूस, जापान, चीन और पश्चिम एशिया के देशों के साथ व्यापारिक संबंध मजबूत किए।


भारत-अमेरिका व्यापार भी प्रतिबंधों के बावजूद पूरी तरह नहीं रुका। इसी दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था ने विकास जारी रखा। 2003 तक भारत की आर्थिक वृद्धि दर करीब 7.8 प्रतिशत तक पहुंच गई।


22 सितंबर 2001 को अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने भारत पर लगाए गए प्रतिबंधों को हटा दिया। इसके बाद दोनों देशों के संबंध धीरे-धीरे मजबूत हुए और 2008 के भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते ने रिश्तों को नई दिशा दी।


अब रूस से भारत के तेल आयात को लेकर अमेरिका की ओर से 100 प्रतिशत तक टैरिफ की संभावना सामने आई है। ऐसे में 1998-2001 का अनुभव फिर चर्चा में है। उस दौर से यह स्पष्ट होता है कि भारत ने आर्थिक संबंधों में विविधता बनाए रखते हुए अमेरिका के साथ संवाद भी जारी रखा था।