भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी रॉ के संस्थापक आरएन काओ ने 1974 में बांग्लादेश के तत्कालीन नेता शेख मुजीबुर रहमान को उनके खिलाफ संभावित सैन्य तख्तापलट की चेतावनी दी थी। यह घटना रॉ के शुरुआती वर्षों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंगों में गिनी जाती है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, काओ ने अपनी पहचान छिपाते हुए ढाका की यात्रा की और मुजीब से मुलाकात की। 


इस घटनाक्रम का विस्तृत विवरण पत्रकार अशोक रैना की 1981 में प्रकाशित पुस्तक Inside RAW: The Story of India's Secret Service में मिलता है। पुस्तक के अनुसार, बांग्लादेशी सेना के कुछ अधिकारियों की कथित बैठक से जुड़ी जानकारी रॉ तक पहुंची थी। इसके बाद काओ ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को जानकारी दी और मुजीब को व्यक्तिगत रूप से चेतावनी देने का फैसला किया। 


दिसंबर 1974 में काओ कथित तौर पर पान निर्यातक के वेश में ढाका पहुंचे। बंगभवन में उन्होंने मुजीब से अकेले में मुलाकात की और उनकी जान को खतरे के बारे में बताया। कुछ विवरणों के अनुसार, काओ ने कथित साजिश में शामिल अधिकारियों के नाम भी बताए। हालांकि, मुजीब इन चेतावनियों से आश्वस्त नहीं हुए। 


मार्च 1975 में रॉ ने एक वरिष्ठ अधिकारी को दोबारा ढाका भेजा। इस बार कथित तौर पर सैन्य इकाइयों और अधिकारियों से जुड़ी अधिक विस्तृत जानकारी मुजीब तक पहुंचाई गई। काओ ने बाद में लिखा कि मुजीब को उनकी जान के खिलाफ सेना की कुछ इकाइयों में साजिश की जानकारी दी गई थी। 


15 अगस्त 1975 को सैन्य अधिकारियों ने ढाका स्थित मुजीब के आवास पर हमला किया। मुजीब और उनके परिवार के कई सदस्यों की हत्या कर दी गई। बाद में बांग्लादेश में इस हत्याकांड से जुड़े सैन्य अधिकारियों पर मुकदमा चला। 


रॉ की चेतावनियों के बावजूद हमला होने की घटना आज भी बांग्लादेश के इतिहास और भारतीय खुफिया तंत्र के शुरुआती अभियानों से जुड़े महत्वपूर्ण प्रसंग के रूप में चर्चा में रहती है। हालांकि, उपलब्ध स्रोत यह भी दिखाते हैं कि उस समय की खुफिया जानकारी और साजिश की पूरी प्रकृति को लेकर अलग-अलग विवरण मौजूद हैं।